जैसे ही हम भ्रष्टाचार शब्द सुनते हैं हमारे जेहन में किसी दूसरे व्यक्ति ख्याल आता है। एक ऐसे व्यक्ति की तस्वीर सामने है जिसने किसी न किसी प्रकार का भ्रष्टाचार किया हो ,यह कितने आश्चर्य की बात है की हम एक बार भी यह नहीं सोचते हैं कि किसी न किसी तरह से हम खुद इसके लिए जिम्मेदार हैं।
आज समाज में तरह तरह की विसंगतियां व्याप्त हो गयी हैं जिसका परिणाम यह हो रहा है कि हम उन्हें अपने जीवन का एक भाग मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। अब समय आ गया है कि अपनी सोई हुयी आत्मा को जगाएं और स्वयं तथा अपने समाज की दुर्दशा होने से बचा लें। देश किसी एक का नहीं है सभी की सामूहिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। भ्रस्टाचार के जड़ में कौन मठ्ठा डालेगा यह कोई नहीं जनता है। जब सभी चाहते हैं की यह रोग जड़ से मिठे तो फिर क्या कारन है क़ि यह घटने के बजाये बढ़ता ही जा है।